Rajkumari Sunaina ki Love Story

 


Part -27

राजा रानी के मन की बात साधु महाराज ने बिना कहे ही जान ली थी।


माता पिता के लिए अपनी संतान से ज्यादा क्या महत्वपूर्ण बात हो सकती है।

साधु की बात मानकर उन्होंने अपनी पुत्री को युद्धकला का प्रशिक्षण दिलाने का निश्चय किया।


हालांकि राज्य में कई व्यक्ति थे जो युद्धकला में निपुण थे किन्तु राजा महेन्द्र सिंह ने वीरेंद्र को बुलाकर राजकुमारी को प्रशिक्षित करने का उत्तरदायित्व सौंपा।


वीरेंद्र के लिए इससे बढ़कर खुशी कोई हो ही नहीं सकती थी।राजकुमारी का सानिध्य प्राप्त करने का इससे अच्छा मौका कोई नहीं हो सकता था।


साथ ही जिस काम को बाद में करने के बारे में वो सोच रहा था वो काम पहले ही हो रहा था 


वो भी बिना किसी प्रयत्न के,ये उसके लिए सोने पर सुहागा वाली बात थी।


राजकुमारी के इतने समीप होने पर वो अपने मन का हाल राजकुमारी को भी सुना सकेगा।


अब तो उसे महसूस होने लगा था कि राजकुमारी के दिल का हाल भी उसके हाल से अलग नहीं था।




Part -28

वे दोनों एक ही किश्ती में सवार थे 

और दोनों का हाल एक जैसा ही था।


राजा महेन्द्र सिंह ने जब सुनयना को वीरेंद्र से युद्धकला सीखने के लिए कहा तो 


राजकुमारी ने नजरें झुका कर उसी क्षण इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।


राजकुमारी इस प्रस्ताव से अत्यंत खुश थी,और होती क्यों ना, 


वीरेंद्र एक बलशाली और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था।राज्य की अनेक कन्याएं उसे अपना वर बनाने का स्वप्न देखा करती थीं।


एक बार वीरेंद्र भी उसके प्रेम का निवेदन स्वीकार कर ले तो उसके मन का डर ख़तम हो जाए।


वैसे राजकुमारी को वीरेंद्र से प्रेम हो गया है इसका अहसास उसे उसकी सखियों ने ही कराया था।


वीरेंद्र के नाम से पलकों का झुक जाना,उसे देखकर दिल की धड़कनों का बढ़ जाना,

उसके सामने आने पर हकलाना शुरू कर देना 


और उसके जाने के बाद बात ना कर पाने का मलाल होना प्रेम की ही तो निशानियां थीं,

जो उसकी सखियों की नजरों से बची नहीं थीं।


अब तो उसकी सखियां समय असमय वीरेंद्र का नाम लेकर उसे चिढ़ाने लगीं थीं।ये एक अच्छा मौका था जब वो दोनों एक दूसरे से अपने दिल की बात कह सकेंगे।



Part -29

राजकुमारी साधु महाराज का धन्यवाद करना चाहती थी। 

उन्हीं की कृपा से उसे यह सुनहरा अवसर मिला था।


उसके मन में अनेक प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे—क्या भविष्य में वीरेंद्र ही उसका वर बनेगा? क्या वीरेंद्र उसका प्रेम निवेदन स्वीकार करेगा?


क्या उसके मन में भी सुनयना के लिए प्रेम है?

क्या वह उसके पिता से उसका हाथ मांगने का साहस कर पाएगा?


इन प्रश्नों के उत्तर शायद साधु महाराज दे सकते थे। यद्यपि समय के साथ इन सवालों के उत्तर मिल ही जाते,

 परंतु यदि इनका समाधान अभी मिल जाए, तो सुनयना को अपार प्रसन्नता होती।


भविष्य जान लेने के बाद वह तय कर सकती थी कि उसे अपने मन को नियंत्रित करना है या अपने दिल को गगन में उड़ने देना है।


अपने पिता से आज्ञा लेकर राजकुमारी अपनी सखियों के साथ साधु महाराज के पास पहुंची। 


उसने साधु महाराज को हाथ जोड़कर अभिवादन किया। 


साधु महाराज ने प्रसन्न होकर उसे अनेकों आशीर्वाद दिए।


सुनयना ने अपने मन की शंका साधु महाराज के सामने रख दी। 

वह अपने संशय का समाधान चाहती थी।


साधु महाराज ने मुस्कुराकर सुनयना की ओर देखा और कहा, "राजकुमारी, तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर मैं दे सकता हूं, परंतु एकांत में।"


एकांत पाते ही साधु महाराज ने झुककर राजकुमारी का अभिवादन किया। 

यह देख सुनयना हड़बड़ा गई।





Part -30

इतने पहुंचे हुए साधु, जो सबका भूत और भविष्य देख सकते थे, राजकुमारी के सामने नतमस्तक खड़े थे।


साधु ने राजकुमारी को हैरानी में देखकर कहा, "राजकुमारी! हैरान मत होइए।"


"आपका जन्म एक बहुत बड़े उद्देश्य के लिए हुआ है।"


"भविष्य में आप एक महान कार्य को अंजाम देने वाली हैं।"


"पर मैं आपसे एक वादा चाहता हूं—आप अपने पुत्र को सबसे पहले मेरे हाथों में देंगी।"


"आपके पुत्र को सबसे पहले मैं अपने हाथों में उठाना चाहता हूं, क्योंकि वही मेरी मुक्ति का कारण बनेगा।"


साधु महाराज की बातें सुनकर राजकुमारी को कुछ समझ नहीं आया।


वह उलझन में थी कि साधु को क्या उत्तर दे।


राजकुमारी की परेशानी देखकर साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजकुमारी! वीरेंद्र आपके होने वाले स्वामी हैं।"


"लेकिन उनके साथ का सुख लंबे समय तक पाने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।"


"वीरेंद्र के सिर पर एक बहुत बड़े कार्य का भार है।"


"आपको पूरी लगन और निष्ठा से उनका साथ देना होगा।"


साधु महाराज ने आगे कहा, "राह मुश्किल तो होगी, पर आप अपनी मंजिल तक जरूर पहुंचेंगी।"


"आपको बस हिम्मत नहीं हारनी है। और अभी मन लगाकर युद्धकला सीख लीजिए।"


"भविष्य में यह कला आपके बहुत काम आएगी।"


राजकुमारी सुनयना यह सुनकर प्रसन्न हो गई कि भविष्य में वीरेंद्र ही उसका जीवनसाथी बनेगा।




Part -31

परंतु साधु की बहुत सी बातें उसे समझ नहीं आईं थीं।


साधु ने फिलहाल ये कहकर उसे संतुष्ट कर दिया था कि अभी सिर्फ वो युद्धकला को सीखने में ध्यान लगाए।


भविष्य में तो जो होना है वो होकर ही रहेगा।

समय समय पर वो साधु उसका पथ प्रदर्शन करने के लिए मिलता रहेगा।


इतना कहकर साधु दूसरे लोगों के पास चला गया था ताकि उनकी समस्याओं का समाधान बता सके।

साधु की बातों के बारे में सोचते सोचते राजकुमारी महल लौट आई थी।


साधु की बातें उसके दिमाग में घूम रहीं थीं।


साधु महाराज के अनुसार भविष्य में कुछ बहुत बड़ा होने वाला था जिसके लिए युद्धकला सीखना अति आवश्यक है,


तो जिसे पहले वो वीरेंद्र के साथ समय बिताने का मौका समझ रही थी, अब एक महत्वपूर्ण कार्य समझने लगी थी।


राजकुमारी सुनयना ने ये निश्चय कर लिया था कि प्रेम को ही हथियार बनाएगी।


आखिर वीरेंद्र का साथ उसे तभी मिल सकता था जब वो भविष्य में आने वाली घटना का सामना करने के लिए तैयार हो जाए।


अगली सुबह उसे वीरेंद्र से युद्धकला सीखने जाना था।


वीरेंद्र ने उसके पास सुबह जल्दी अभ्यास के लिए आने का संदेश पहुंचा दिया था।


अपने मन में एक निश्चय करके राजकुमारी सोने चली गई आने वाली सुबह के लिए।




Part -32

राजकुमारी ने ये तय कर लिया था कि अब वो जल्द से जल्द युद्ध कला में निपुण हो जाएगी।


उसे वीरेंद्र का साथ लंबे समय तक चाहिए और भविष्य में घटने वाली घटनाओं में उसका युद्ध प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है।


राजकुमारी ने पूरे मन से युद्ध कला को सीखना आरंभ कर दिया था।


वीरेंद्र के साथ होने पर सुनयना को किसी खतरे से डर नहीं लगता था।


एक नाज़ुक सी राजकुमारी जो शायद फूल के प्रहार से भी घायल हो जाए, आजकल भारी भरकम तलवार चलाने का अभ्यास कर रही थी।


ऐसा अक्सर होता है जब बात प्रेम पाने की हो तो उस समय तो चाहे कोई आसमान के तारे मांग ले, प्रेमी तो पागल होते हैं, क्या पता आसमान तक सीढ़ी लगा दें।


यहां भी बात प्रेम की ही थी जब वीरेंद्र ने डरते डरते अपने प्रेम का इजहार किया, तब राजकुमारी को पक्का विश्वास हो चला था कि साधु महाराज ने जो कहा था वो सच होकर रहेगा।


भविष्य के गर्भ में जरूर कोई रहस्य छुपा हुआ है जो उसके प्रेम की परीक्षा लेना चाहता है।



Part -33

वीरेंद्र के प्रेम के निवेदन को राजकुमारी ने ये वादा लेकर स्वीकार कर लिया था


कि उनके प्रेम का पता तब तक किसी को नहीं चलना चाहिए जब तक वो युद्ध कला में निपुण नहीं हो जाती।


वीरेंद्र भी तो यही चाहता था, राजकुमारी को अपना इरादा पक्का करना होगा, 


मन में एक विश्वास जगाना होगा कि वो कमजोर नहीं है और जरूरत पड़ने पर कोई भी कदम उठा सकती है।


वीरेंद्र जितनी लगन से राजकुमारी को तलवार चलाना सीखा रहा था, 


राजकुमारी उतनी ही लगन से इसे सीख रही थी।


साथ-साथ वीरेंद्र राजकुमारी के मन में ये बात बिठाने में भी कामयाब रहा था कि वह 


कभी राजकुमारी का साथ नहीं छोड़ेगा, चाहे कितनी ही मुश्किलें सामने आ जाएं।


राजकुमारी सुनयना के दिल ने इस बात पर विश्वास कर लिया था, 


पर दिमाग कभी-कभी डरा देता था कि क्या 


महाराज सचमुच एक रक्षक को अपनी पुत्री खुशी-खुशी सौंप देंगे?


क्या सचमुच वीरेंद्र एक राजा से बगावत कर पाएगा, 


एक ऐसे राजा से जिसके राज्य का एक-एक व्यक्ति अपने राजा के इशारे पर अपने प्राण दे सकता है?




Part -34

पर जैसा हमेशा होता है ना, प्रेम में सिर्फ दिल की जीत होती है।


दिमाग जिन खतरों के प्रति आगाह करता है, उसे सिर्फ वहम कहकर दूर फेंक दिया जाता है।


राजकुमारी को भी अपने माता-पिता पर पूरा विश्वास था कि सच्चाई जानने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा, 


और अगर हुआ भी तो वीरेंद्र है ना, सब संभालने के लिए।


राजकुमारी तो प्रेम के उस पथ पर आगे निकल चुकी थी, 


जहां दुनिया की, समाज की कोई परवाह रह ही नहीं जाती।


जहां कोई सच्चा लगता है तो सिर्फ प्रेमी।


वीरेंद्र ही उसका स्वामी होगा, चाहे कोई कुछ कहे या कुछ करे।


राजकुमारी बहुत तेजी से अपना अभ्यास पूरा कर रही थी।


वीरेंद्र की अपेक्षा से भी अधिक तेजी से।




एक अंधेरी सुनसान रात में, जब बाहर कोई व्यक्ति नहीं था, 


कभी-कभी दूर किसी कुत्ते के भोंकने की आवाज सुनाई देती थी।


एक व्यक्ति अपना चेहरा छुपा कर तेजी से एक तरफ बढ़ता जा रहा था, 


साथ ही उसने इस बात का भी ध्यान रखा था कि कोई उसे यहां आते हुए ना देख ले।






Part -35

साधु की कुटिया पर उसने सांकेतिक रूप से इशारा किया था।


जल्दी ही दरवाजा खुला और वो व्यक्ति कुटिया में जा घुसा था।


अंदर जाने से पहले उसने एक बार फिर सतर्क नजरों से चारों ओर देखा था।


दरवाजा बंद करके वो व्यक्ति साधु को हाथ जोड़कर प्रणाम करता है और कहता है,


युवक - "महाराज! हमारी सभी कोशिशें कामयाब हो रही हैं।


राजकुमारी बहुत अच्छे से अभ्यास कर रही हैं, शीघ्र ही वो इसमें कामयाब हो जाएंगी।


शीघ्र ही वो दिन आएगा, जिसका आपको सदियों से इंतजार था, 




जल्दी ही आपका सपना पूर्ण होगा।"


साधु की आंखों में आंसू तैरने लगे थे, वो बोले - "तुम नहीं जानते कि मैंने इस दिन का कितना इंतजार किया है।



राजकुमारी सुनयना ने आने में बहुत देर लगा दी।


मैं नहीं जानता था कि इस दिन को आने में इतना समय लगेगा।


अपनी कई पीढ़ियों को अपनी आंखों के सामने ख़त्म होते देखने का क्या दुख होता है, ये कोई मुझ अभागे से पूछे,


जिसके पुत्र-पोत्र उसकी आंखों के सामने ख़त्म हो गए हों और मैं अभागा एक श्राप को सदियों तक भोगने के लिए जिंदा रहा।”





Part - 36

पर अब जल्दी ही हमारा राज्य इस श्राप से छुटकारा पा जाएगा।

जल्दी ही मुझे मुक्ति मिलेगी।


जिस दिन मैं अपने हाथों में तुम्हारे और सुनयना के पुत्र को लूंगा, वो दिन मेरे दुखों के अंत का दिन होगा।



वीरेंद्र! तुम मेरी मुक्ति का कारण बनोगे।

मैं तुम्हारा आभारी रहूंगा।



वीरेंद्र ने साधु के हाथ पकड़ लिए थे और रोते हुए बोला -

"बाबा! ऐसा मत कहिए।



जितना कष्ट आपने झेला है, उतना कष्ट कोई नहीं झेल सकता।

हम जल्दी ही उस जादुई कमल को प्राप्त कर लेंगे जिसकी वजह से आपने इतने कष्ट झेले हैं।



शीघ्र ही हमारा राज्य श्राप मुक्त हो जाएगा और आप भी।

मुझे पूरा यकीन है कि राजकुमारी अपने पथ से विचलित नहीं होगी।



आपने राजकुमारी को युद्धकला सीखने के लिए तैयार करके हमारे लिए राह आसान कर दी है।"


साधु बोले -

"राजकुमारी सुनयना बहुत भोली और अच्छी है।

उसकी सच्चाई ही उसका वरदान है।

कमल पाने का रास्ता आसान नहीं है।



अगर राजकुमारी खुद को मजबूत न बनाती, तो वो कमल तक कभी नहीं पहुंच सकती थी।”




Part - 37

उन्हें अपने डर पर काबू करना आना चाहिए।

याद रखना, वीरेंद्र! राजकुमारी हमारे लिए आदरणीय है।

कभी गलती से भी उनका अपमान न हो।

हमारी सच्चाई उन्हें तुम दोनों के विवाह से पहले पता नहीं चलनी चाहिए।

हम नहीं चाहते कि वह कोई पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो और कमल लाने से इंकार कर दें।








वीरेंद्र ने कहा -

"नहीं बाबा! ऐसा नहीं होगा।

राजकुमारी का मेरे प्रति प्रेम सच्चा है और मुझे विश्वास है कि वह हमारी सहायता अवश्य करेगी।"


साधु बोले -

"मैं जानता हूं कि तुम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हो।

नियति ने तुम्हारा साथ लिखकर भेजा है।



किन्तु याद रखना, नियति भी अपने खेल तब खेलती है जब हम कोई निर्णय ले लेते हैं।

इसलिए विवाह से पहले राजकुमारी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।



तुम उनका प्रशिक्षण पूरा करवाओ।

तब मैं महाराज से तुम्हारे विवाह की बात करूंगा।



लेकिन उससे पहले तुम्हें एक काम और करना होगा।"


HIMANSHU

मेरा नाम हिमांशु है और में इस वेबसाइट का लेखक और एडिटर हु| मेरा हमेशा यही कोशिश रहेगा की आपको इस वेबसाइट पर जो भी लेख मिले वो पूरी तरह से सही हो और आपको आपके सवालो के सभी जवाब सरल भाषा में मिले|

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